दिल्ली। हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पति की निगरानी रखने वाले उपग्रह-बदलते मौसमों में घास के मैदान पनपने, वन क्षेत्र के रंग परिवर्तन, घाटियों में पेड़-पौधों में बदलाव, जलवायु संवेदनशीलता, मौसम स्थिति अनुकुलूता और बढ़ती चिंता की कहानी बयां करते हैं।

पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं, जो वैश्विक जोखिम और आपदाओं को और गंभीर बनाते हैं। जलवायु परिवर्तन वैश्विक औसत सतह तापमान को प्रभावित करता है, वर्षा की पद्धति में बदलाव लाता है और वनस्पति के आच्छादन को प्रभावित करता है। यह विभिन्न स्थानिक और समय अवधि पैमाने पर स्थानीय निगरानी के महत्व को रेखांकित करता है।
उपग्रह डेटा को व्यापकता से संसाधित करने वाले वैश्विक प्लेटफॉर्म गूगल अर्थ इंजन (जीईई) का पर्यावरण निगरानी और पृथ्वी अवलोकन के लिए उपयोग से भू-क्षरण, मिट्टी और धूल संबंधी गतिशीलता, शहरी विकास, तापमान में बदलाव और इससे प्रभावित होने वाले स्वास्थ्य का अध्ययन होता है। यह डेटा के पूर्व-प्रसंस्करण और इन्हें संग्रहित करने की आवश्यकताएं कम करके वृहद विश्लेषण को सुगम बनाता है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, नैनीताल स्थित आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान – एआरआईईएस के अनुसंधानकर्ताओं ने भारत और विदेश के विशेषज्ञ सहयोगियों के साथ मिलकर वर्ष 2001 से वर्ष 2022 तक उत्तराखंड की वनस्पति के साथ ही प्रदूषण और जलवायु प्रभावों पर नज़र रखने के लिए गूगल अर्थ इंजन का सहारा लिया।
वनस्पति में होने वाले परिवर्तनों के विश्लेषण के लिए उन्होंने सरल काल्पनिक स्थितिजन्य माप, सामान्यीकृत अंतर वनस्पति सूचकांक – एनडीवीआई का उपयोग किया। यह उपग्रह-आधारित रिमोट सेंसिंग विधि है, जिसका उपयोग पौधों की सघनता, हरियाली और स्वास्थ्य के आकलन के लिए किया जाता है।
आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान के डॉ. उमेश चंद्र दुमका के नेतृत्व वाली टीम द्वारा अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ किए गए अनुसंधान से जलवायु संवेदनशीलता, मौसम स्थिति अनुकूलता और घटते वनस्पति क्षेत्र का खुलासा हुआ है। अनुसंधान परिणाम एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग एंड असेसमेंट (स्प्रिंगर नेचर पब्लिकेशन) में प्रकाशित हुए हैं।



