Friday, June 5, 2026
HomeChhattisgarhमहाराष्ट्र सीमा से सटे अबूझमाड़ की...

महाराष्ट्र सीमा से सटे अबूझमाड़ की पदमकोट पंचायत में विकास की नई धारा: जल जीवन मिशन से बदली ग्रामीणों की जिंदगी

Banner Advertising

​रायपुर,05 जून 2026/

कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, घने जंगलों से घिरा दुर्गम रास्ता और आधुनिक बुनियादी सुविधाओं से मीलों की दूरी—यह पहचान रही है छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर पर बसे अबूझमाड़ क्षेत्र की। लेकिन आज इसी अबूझमाड़ की एक पंचायत विकास की नई इबारत लिख रही है। महाराष्ट्र सीमा से सटी जिला मुख्यालय नारायणपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत पदमकोट में ‘जल जीवन मिशन’ ने न केवल हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाया है, बल्कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य, स्वच्छता और आजीविका की तस्वीर भी बदल कर रख दी है।
​कभी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करने वाला यह दूरस्थ वनांचल गांव आज सौर ऊर्जा आधारित जलापूर्ति व्यवस्था के जरिए ग्रामीण विकास और समावेशी प्रगति का एक प्रेरक मॉडल बनकर उभरा है।

​सौर ऊर्जा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अनूठा संगम

​अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना जिला प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती थी। बिजली की अनिश्चितता और कठिन रास्तों के बीच जल जीवन मिशन के अंतर्गत एक ऐसी कार्ययोजना तैयार की गई जो आत्मनिर्भर और पर्यावरण अनुकूल हो।

​गांव में निर्बाध पानी की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी और बुनियादी ढांचे का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया गया है। गांव के हर कोने और हर घर को जोड़ने के लिए करीब चार किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है। बिजली पर निर्भरता खत्म करने के लिए 10-10 हजार लीटर क्षमता की चार सोलर पानी टंकियों का निर्माण किया गया है। इस पूरी व्यवस्था के माध्यम से पंचायत के शत-प्रतिशत परिवारों को उनके घर पर ही नियमित और स्वच्छ पेयजल मिल रहा है।

​महिलाओं के श्रम को मिला सम्मान, बच्चों को मिला शिक्षा का अवसर

महाराष्ट्र सीमा से सटे अबूझमाड़ की पदमकोट पंचायत में विकास की नई धारा: जल जीवन मिशन से बदली ग्रामीणों की जिंदगी

​इस सफलता की कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आया बदलाव है। पहले इस गांव की महिलाओं और बच्चों का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ पीने का पानी सहेजने में बीत जाता था। उन्हें मीलों पैदल चलकर जलस्रोतों तक जाना पड़ता था। अब घर के आंगन में ही शुद्ध जल उपलब्ध होने से महिलाओं का समय और श्रम दोनों बच रहा है। इस समय का उपयोग वे स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जुड़कर आजीविका गतिविधियों और सामाजिक कार्यों में कर रही हैं। वहीं, पानी भरने के काम से मुक्त होकर बच्चे अब नियमित रूप से स्कूल जा पा रहे हैं और रचनात्मक गतिविधियों में समय बिता रहे हैं।

​स्वास्थ्य, स्वच्छता और ‘किचन गार्डन’ से पोषण क्रांति

​पदमकोट में शुद्ध पेयजल सिर्फ प्यास बुझाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि इसने गांव के समग्र स्वास्थ्य और पोषण के स्तर को ऊपर उठाया है। स्वच्छ और सुरक्षित पानी मिलने से गांव में डायरिया, पीलिया और पेट से जुड़ी अन्य जलजनित बीमारियों के मामलों में भारी कमी आई है। पर्याप्त पानी की उपलब्धता से ग्रामीणों में व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वच्छता के प्रति रुचि बढ़ी है, जिससे घरों का वातावरण स्वच्छ रहने लगा है। नियमित जलापूर्ति का सबसे अनोखा लाभ पोषण के रूप में दिख रहा है। ग्रामीणों ने अपने घरों के पीछे ‘किचन गार्डन’ (बाड़ी) विकसित कर लिए हैं। नल के पानी का उपयोग कर वे मौसमी और पौष्टिक सब्जियां उगा रहे हैं। इससे परिवारों को ताजी सब्जियां मिल रही हैं, बाजार पर निर्भरता कम हुई है और उनके भोजन में विविधता आई है।

प्रशासनिक प्रतिबद्धता और आत्मनिर्भरता का नया मॉडल

​ग्राम पंचायत पदमकोट की यह सफलता साबित करती है कि अगर प्रशासनिक प्रतिबद्धता, सटीक योजना और सतत निगरानी हो, तो देश के सबसे पिछड़े और सुदूर अंचलों तक भी विकास की धारा पहुंचाई जा सकती है।
​पदमकोट के ग्रामीणों का कहना है कि जल जीवन मिशन ने उन्हें केवल पानी नहीं दिया, बल्कि उनके भीतर एक नया आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना पैदा की है। आज महाराष्ट्र की सीमा पर बसा अबूझमाड़ का यह आखिरी गांव छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए इस बात का जीवंत उदाहरण है कि स्वच्छ पेयजल किस तरह एक बेहतर जीवन, सुदृढ़ स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य का मजबूत आधार बन सकता है।

RELATED ARTICLES
spot_img

Most Popular