Thursday, April 23, 2026
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भारतीय रेलवे ने जोनों में लगाए 81 लाख 59 हजार पेड़, ट्रैक के किनारे वृक्षारोपण से मिट्टी का कटाव रुका

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दिल्ली। जब विश्व “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” थीम के साथ विश्व पृथ्वी दिवस 2026 मना रहा है, तब भारतीय रेल पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः सुदृढ़ करती है। प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक यात्रियों को देश के विशाल और विविध भूभाग में ले जाने वाली भारतीय रेल केवल एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि अपने व्यापक आकार, पहुंच और संकल्प के साथ भारत को हरित भविष्य की ओर अग्रसर करने वाली एक सशक्त संस्था है।

पिछले एक दशक में, भारतीय रेलवे ने बुनियादी ढांचे की योजना, स्टेशन प्रबंधन, रोलिंग स्टॉक और भूमि उपयोग में पर्यावरणीय जवाबदेही को शामिल करते हुए अपने संचालन को व्यवस्थित रूप से बदला है। आज यह सतत परिवहन के क्षेत्र में विश्व के सबसे प्रभावशाली संस्थानों में से एक बनकर उभरी है।

हरियाली के साथ सुरक्षित सफर: कैसे भारतीय रेल का वृक्षारोपण अभियान बदल रहा है रेल मार्ग

भारतीय रेलवे का वृक्षारोपण अभियान सभी जोन में लागू किया जा रहा है, जो पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में एक समन्वित राष्ट्रव्यापी प्रयास को दर्शाता है। वर्ष 2025-26 के दौरान लगाए गए कुल 81.59 लाख पौधों में से प्रमुख योगदान पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (9.3 लाख), दक्षिण मध्य रेलवे (9 लाख), पूर्वोत्तर रेलवे (8.7 लाख) और उत्तरी रेलवे (8.5 लाख) का रहा है। रेलवे ट्रैक, स्टेशन परिसरों और उपलब्ध भूमि पर व्यापक वृक्षारोपण से विभिन्न क्षेत्रों में हरित आवरण बढ़ रहा है। यह पहल कार्बन उत्सर्जन को कम करने, जैव विविधता को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय परिस्थितियों में सुधार लाने में सहायक है, जिससे यात्रियों के लिए रेल यात्रा अधिक हरित और स्वास्थ्यकर बन रही है।

यह व्यापक वृक्षारोपण प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हुए जलवायु लचीलापन को भी मजबूत करता है, साथ ही शोर और धूल को कम करने में मदद करता है। बेहतर हरित आवरण स्टेशनों और रेल मार्गों के आसपास सूक्ष्म जलवायु को संतुलित करता है, जिससे यात्रियों को अधिक आरामदायक यात्रा अनुभव मिलता है।

इसके अतिरिक्त, रेलवे पटरियों के किनारे वृक्षारोपण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधने में मदद करती हैं, जिससे कटाव कम होता है और विशेष रूप से पहाड़ी एवं अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भूस्खलन को रोका जा सकता है। वनस्पति आवरण सतह के बहाव को नियंत्रित करता है और जल अवशोषण को बढ़ाता है, जिससे पटरी के अस्थिर होने का जोखिम कम होता है। ये प्रकृति-आधारित उपाय न केवल रेलवे परिसंपत्तियों की सुरक्षा करते हैं, बल्कि यात्रियों के लिए अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय यात्रा भी सुनिश्चित करते हैं।

जल: संचयन, पुनर्चक्रण, ऑडिटिंग और पुनरुद्धार

जल संकट इस सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। प्रतिदिन लाखों लीटर पानी का उपयोग करने वाली भारतीय रेल- जो सैकड़ों वॉशिंग लाइनों, मेंटेनेंस डिपो, कैटरिंग इकाइयों और यात्री सुविधाओं का संचालन करती है, ने अपने जल उपयोग को संतुलित करने के लिए ठोस और मापनीय कदम उठाए हैं। इसकी रणनीति व्यापक है: वर्षा जल का संग्रह, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण, जल उपयोग का ऑडिट और रेलवे भूमि पर स्थित जल निकायों का पुनर्जीवन।

छत पर वर्षा जल संचयन (आरडब्ल्यूएच): जहां बारिश हो रही है वहीं उसका संचयन

2016-17 से अब तक भारतीय रेल ने सभी जोनों में कुल 8,313 रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं स्थापित की हैं। पिछले दो वर्षों में ही 2,915 नई संरचनाएं जोड़ी गईं, जिनमें 2024-25 में जल संचय जन भागीदारी अभियान के तहत 1,215 इकाइयां शामिल हैं। दक्षिण मध्य रेलवे इस पहल में अग्रणी है, जिसने 3,128 संरचनाएं स्थापित की हैं।

ये संरचनाएं मानसून के दौरान वर्षा जल को संग्रहित कर एक ओर जलभराव रोकती हैं और दूसरी ओर भूजल स्तर को पुनर्भरित करती हैं। राजस्थान जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों या दक्कन के वर्षाछाया क्षेत्रों में ये प्रणालियां संचालन के लिए जीवनरेखा साबित हो रही हैं।

जल पुनर्चक्रण संयंत्र

भारतीय रेल ने सभी जोनों में कुल 185 जल पुनर्चक्रण संयंत्र स्थापित किए हैं। 2015-16 से पहले जहां केवल 21 संयंत्र थे, वहीं पिछले वित्त वर्ष में ही 26 नए संयंत्र स्थापित किए गए। उत्तरी रेलवे 27 संयंत्रों के साथ अग्रणी है। ये संयंत्र कोच वॉशिंग और यार्ड संचालन से निकलने वाले जल को शुद्ध कर पुनः उपयोग योग्य बनाते हैं, जिससे ताजे जल की खपत कम होती है।

जल ऑडिट

2015-16 से अब तक सभी रेलवे ज़ोन में कुल 1,944 जल ऑडिट किए गए हैं, जिनमें से 2025-26 में अकेले 310 ऑडिट हुए हैं। दक्षिण मध्य रेलवे 442 ऑडिट के साथ शीर्ष पर है। ये ऑडिट पानी की अत्यधिक खपत वाले क्षेत्रों, पाइपों के रिसाव और सिस्टम की खामियों की पहचान करते हैं, जिससे पानी की लक्षित बचत संभव होती है।

जल निकायों का पुनरुद्धार: प्रकृति को लौटाना

भारतीय रेलवे ने अपनी भूमि या उसके पास स्थित 109 जल निकायों (तालाब, टैंक और आर्द्रभूमि) का पुनरुद्धार किया है जो अतिक्रमण या उपेक्षा का शिकार थे। दक्षिण मध्य रेलवे (34) और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (44) इसमें अग्रणी रहे हैं। ये पुनर्जीवित जल निकाय न केवल रेलवे बल्कि आसपास के समुदायों के लिए भी जल स्तर सुधारने और बाढ़/सूखे से निपटने में मददगार साबित हो रहे हैं।

अहमदाबाद के कांकरिया में भारत का पहला जल-तटस्थ रेलवे डिपो

पश्चिम रेलवे के तहत अहमदाबाद का कांकरिया कोचिंग डिपो भारत की उन दुर्लभ औद्योगिक सुविधाओं में से एक बन गया है जो पूर्णतः ‘वॉटर-न्यूट्रल’ (जल-तटस्थ) है। यह डिपो कोच की धुलाई और रखरखाव के दौरान उत्पन्न लगभग सभी अपशिष्ट जल का उपचार और पुन: उपयोग करता है, जिससे बाहरी ताजे पानी के स्रोतों पर इसकी निर्भरता समाप्त हो गई है।

विद्युतीकरण मिशन: एक निर्णायक बदलाव

यदि कोई एक ऐसा बदलाव है जिसने भारतीय रेलवे के पर्यावरणीय स्वरूप को मौलिक रूप से बदल दिया है, तो वह है ब्रॉड गेज नेटवर्क का आक्रामक विद्युतीकरण। भारतीय रेलवे ने अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क का 99.6% विद्युतीकरण कर दिया है। मार्च 2026 तक 69,873 रूट किलोमीटर (आरकेएम) विद्युतीकृत हो चुके हैं, जो 2014 में मात्र 21,801 आरकेएम था।

भारतीय रेलवे ने 2016-17 की तुलना में 2024-25 में 178 करोड़ लीटर डीजल बचाया है, जो कि 62% की बचत है। पश्चिम एशिया संकट के बीच इसने कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता को कम किया है। डीजल से हटकर नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाली बिजली की ओर कदम बढ़ाना न केवल हरित विकल्प है, बल्कि वित्तीय रूप से भी जिम्मेदारी भरा निर्णय है।

बायो-टॉयलेट: रेल पर पर्यावरण के अनुकूल स्वच्छता

भारतीय रेलवे ने बायो-टॉयलेट के माध्यम से यात्री स्वच्छता में बड़ा योगदान दिया है, 2014 से अब तक यात्री डिब्बों में 3.66 लाख से अधिक बायो-टॉयलेट लगाए गए हैं। इस पहल ने पटरियों पर मानव अपशिष्ट के सीधे विसर्जन को समाप्त कर दिया है। यह स्वदेशी तकनीक सूक्ष्मजीवों के उपयोग से अपशिष्ट को पानी और गैसों में बदल देती है, जिससे दुर्गंध और प्रदूषण कम होता है और रेलवे संपत्तियों का क्षरण भी रुकता है।

यह पहल मिट्टी और ट्रैक के दूषित होने से रोककर, रेलवे की संपत्तियों में जंग लगने की समस्या को कम करके और पर्यावरण-अनुकूल कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देकर पर्यावरण की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सीधे तौर पर किसी भी तरह के कचरे का निकास न होने देने और टिकाऊ स्वच्छता पद्धतियों का समर्थन करके, भारतीय रेलवे यात्रियों के आराम को बेहतर बना रहा है, साथ ही एक स्वच्छ पारिस्थितिकी तंत्र और एक हरित भविष्य में भी अपना योगदान दे रहा है।

नवीकरणीय ऊर्जा: सूर्य और पवन से भविष्य को ऊर्जा

दिसंबर 2025 तक, रेलवे नेटवर्क में लगभग 909 मेगावाट के सौर संयंत्र और 103 मेगावाट के पवन ऊर्जा संयंत्र चालू किए जा चुके हैं। इसके अलावा, रेलवे ने राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के डेवलपर्स के साथ सौर, पवन और हाइब्रिड माध्यमों से 3,300 मेगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय क्षमता के लिए समझौता किया है। यह कदम दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और मूल्य-स्थिर हरित बिजली की खरीद की ओर एक सोची-समझी पारी है।

एलईडी लाइटिंग: कुशलता से जगमगाता नेटवर्क

भारतीय रेलवे ने अपने सभी कार्यालयों, स्टेशनों और आवासीय कॉलोनियों में 100% एलईडी लाइटिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया है। इससे न केवल बिजली की खपत कम हुई है, बल्कि रोशनी की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है, जिससे यात्रियों के लिए वेटिंग हॉल और प्लेटफॉर्म अधिक सुरक्षित और बेहतर हो गए हैं।

ऊर्जा संरक्षण: राष्ट्रीय पहचान

भारतीय रेलवे ने ऊर्जा दक्षताके मामले में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। व्यक्तिगत प्रयासों से आगे बढ़ते हुए रेलवे ने अपने पूरे सिस्टम में ‘संरक्षण की संस्कृति’ को आत्मसात कर लिया है। इसी का परिणाम है कि राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार (NECA) 2025 में भारतीय रेलवे ने 3 अलग-अलग श्रेणियों में कुल 7 पुरस्कार अपने नाम किए हैं।

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