रायपुर। कलिंगा विश्वविद्यालय के कला एवं मानविकी संकाय के अंतर्गत शहीद वीर नारायण सिंह रिसर्च चेयर द्वारा “वचन से विजन तक: महात्मा बसवेसरैया आईडिया इन कनटेम्पररी सोसायटी” विषय पर 25 अगस्त को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उक्त संगोष्ठी में अतिथि विद्वान, प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विश्वविद्यालय के विद्यार्थी उपस्थित थें। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में 60 से अधिक पंजीकृत प्रतिभागियों ने आफलाइन और आनलाईन माध्यम से जुड़कर हिस्सा लिया।
संगोष्ठी का शुभारंभ देवी सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन और पुष्पांजलि के साथ हुआ। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि डॉ. गिरजा शंकर गौतम, सहायक प्राध्यापक, मौलिक विज्ञान विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, डॉ. दिवाकर तिवारी, अधिष्ठाता, कला एवं मानविकी संकाय, आईएसबीएम विश्वविद्यालय, गरियाबंद, कलिंगा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर. श्रीधर, कला एवं मानविकी संकाय की अधिष्ठाता डॉ. शिल्पी भट्टाचार्य, विधि संकाय के अधिष्ठाता डॉ. अजीम खान पठान और शहीद वीर नारायण सिंह शोध पीठ के समन्वयक डॉ. अजय शुक्ल उपस्थित थे।


अपने स्वागत भाषण में, कुलपति डॉ. आर. श्रीधर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि युगों-युगों के बाद भी, महात्मा बसवेसराय की शिक्षाएँ आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने महात्मा बसवेसराय के रूढ़िवादी विश्वासों के विरोध और कर्म के महत्व को फैलाने तथा सामाजिक एकता को बढ़ावा देने में उनके योगदान पर प्रकाश डाला।
मुख्य वक्ता के रुप में उपस्थित पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ.गिरजाशंकर गौतम ने शोध विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि दक्षिण भारत में सामाजिक जागरूकता को फ़ैलाने में महात्मा बसवसरैय्या ने वही काम किया है,जो उत्तर भारत में संत कबीर और तुलसीदास जी ने किया है। अस्पृश्यता के खिलाफ और नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में उन्होंने लोगों को जागरूक किया और लिंगायत संप्रदाय के माध्यम से देश की राष्ट्रीय एकता को जोड़ने में उनका विशेष योगदान है।
विशेष वक्ता के रुप में उपस्थित आईएसबीएम युनिवर्सिटी के डॉ.दिवाकर तिवारी ने अपने उद्बोधन में कहा कि समकालीन परिदृश्य में संत बसवसरैय्या के वचन और जीवन दृष्टि आधुनिक विचारों से ओतप्रोत है।जिसमें महिलाओं के सशक्तिकरण, जाति-पाति के खंडन,कर्म की प्रधानता और राष्ट्रीय एकीकरण के संदर्भ में उनके विचारों से हम सभी को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। विधि संकाय के अधिष्ठाता डॉ. अजीम खान पठान ने बताया कि लोकतंत्र की संकल्पना में संत बसवसरैय्या की महत्वपूर्ण भूमिका है। बारहवीं शताब्दी में ही उन्होंने लोक संसद की आधारशिला रखी थी। सामाजिक समानता और स्त्रियों के अधिकारों के प्रति उनके महत्वपूर्ण योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

उक्त राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम तकनीकी सत्र में शोध-पत्रों का आफलाइन प्रेजेंटेशन हुआ। जबकि दूसरे तकनीकी सत्र में आनलाइन प्रस्तुति हुयी। जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े हुए अनेक विद्वान प्राध्यापक,शोधार्थी और विद्यार्थियों ने अपने शोधपत्रों की प्रस्तुति दी। जिसके केन्द्र बिन्दु में वर्तमान परिदृश्य में महात्मा बसवेसरैया के वचन साहित्य की प्रासंगिकता के साथ-साथ उनके जीवन दर्शन, लोकतंत्र की परिकल्पना, महिला सशक्तिकरण, जातिवाद का विरोध एवं लिंगायत संप्रदाय से संबंधित विभिन्न शोध-पत्रों का वाचन था।
संगोष्ठी में कुल 24 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। उल्लेखनीय है कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के सभी स्वीकृत शोध पत्र समकक्ष-समीक्षित पत्रिका IIRCJ में प्रकाशित किए जाएँगे और एक संपादित पुस्तक में भी शामिल किए जाएँगे।
उक्त राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन बीएजेएमसी तृतीय सेमेस्टर की विद्यार्थी सुश्री सोनालिका मोंटेरियो और बीबीए तृतीय सेमेस्टर की विद्यार्थी सुश्री आशी जैन ने किया जबकि समापन सत्र में भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. ए. राजशेखर ने सम्मेलन में उपस्थित अतिथि एवं शोधार्थियों के साथ समस्त उपस्थितजनों के प्रति आभार प्रदर्शन के साथ धन्यवाद ज्ञापित किया।
उक्त आयोजन में डॉ. अनिता सामल, डॉ.योगेश वैष्णव, डॉ. मोहम्मद शकील, डॉ. ग्रीष्मा गोपीनाथ, डॉ. ईशा चटर्जी, डॉ. बभूति कश्यप, डॉ. अभिषेक अग्रवाल, डॉ. मनोज मैथ्यू, डॉ,सुनील टाईगर, डॉ. रकीबुल हसन, पलक शर्मा, जेसिका मिंज, मौली चक्रवर्ती, मौमिता पाल, सुश्री तिथि वर्मा, तुहिना चौबे, एल.ज्योति रेड्डी, सोनल सिंह, सृष्टि