Thursday, March 12, 2026
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रायपुर में विज्ञान शोधार्थियों के लिए तीन दिवसीय रूसा 2.0 प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन

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रायपुर, 12 मार्च, 2026। रायपुर संभाग के विज्ञान शोधार्थियों के लिए आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का तीसरा एवं अंतिम दिन आज शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर में रूसा 2.0 (प्रिपरेटरी ग्रांट) के अंतर्गत संपन्न हुआ। कार्यक्रम के संबंध में जानकारी देते हुए आयोजन समिति के सदस्य डॉ. गोवर्धन व्यास ने बताया कि अंतिम दिन आयोजित विभिन्न तकनीकी सत्रों के माध्यम से प्रतिभागियों को आधुनिक शोध पद्धतियों तथा ल्यूमिनेसेंस के वैज्ञानिक उपयोगों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई।
पहले तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. कलोल कुमार घोष, पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में शोध के विभिन्न आयामों, शोध कार्य के लिए प्रेरणा, शोध परियोजनाओं हेतु प्रमुख वित्तपोषण एजेंसियों तथा कम्प्यूटेशनल केमिस्ट्री की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विशेष रूप से डेंसिटी फंक्शनल थ्योरी (डीएफटी) के रसायन विज्ञान में उपयोग को सरल एवं व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया, जिससे प्रतिभागियों को आधुनिक शोध पद्धतियों की स्पष्ट समझ प्राप्त हुई।
दूसरे तकनीकी सत्र में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की डॉ. नमिता ब्राम्हे ने “ल्यूमिनेसेंस एवं उसके वैज्ञानिक अनुप्रयोग” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि ल्यूमिनेसेंस वह प्रक्रिया है जिसमें बिना ताप उत्पन्न किए प्रकाश का उत्सर्जन होता है, जो ऊर्जा स्तरों के बीच इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के कारण होता है। उन्होंने इसके बहुआयामी उपयोगों की जानकारी देते हुए बताया कि भौतिकी में इसका प्रयोग ऑप्टिकल उपकरणों और फोटोनिक पदार्थों में, रसायन विज्ञान में अभिक्रिया तंत्र और ऊर्जा स्थानांतरण प्रक्रियाओं के अध्ययन में तथा जीवविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में बायोइमेजिंग, सेंसिंग और चिकित्सीय निदान में किया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण किस प्रकार प्रकाश उत्सर्जन का कारण बनते हैं तथा आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी में ल्यूमिनेसेंट पदार्थों का महत्व निरंतर बढ़ रहा है।

रायपुर में विज्ञान शोधार्थियों के लिए तीन दिवसीय रूसा 2.0 प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन
समापन सत्र में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. धु्रव कुमार पाण्डे ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम की पूर्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में जिज्ञासा, अनुसंधान की प्रवृत्ति तथा नए विचारों को विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों को नए दृष्टिकोण प्रदान करते हैं और उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा देते हैं।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. गोवर्धन व्यास ने तीनों दिनों के प्रशिक्षण का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक सत्र के प्रमुख बिंदुओं और वक्ताओं के योगदान का उल्लेख किया।
आयोजन समिति के सदस्य डॉ. लखपति पटेल ने बताया कि प्रशिक्षण में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ कम्प्यूटेशनल अभ्यास का प्रभावी समन्वय किया गया। नैनोमटेरियल, ल्यूमिनेसेंस तथा डीएफटी आधारित ऑप्टिमाइजेशन से संबंधित सत्रों और प्रायोगिक सिमुलेशन प्रशिक्षण ने प्रतिभागी शिक्षकों की शोध अभिरुचि और तकनीकी दक्षता को और मजबूत किया।
कार्यक्रम के सह-समन्वयक डॉ. अखिलेश जाधव ने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम ने बहुविषयक शोध, कम्प्यूटेशनल दक्षता और नवाचार आधारित उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. अनिल रामटेके द्वारा किया गया तथा सत्र के अंत में डॉ. गोवर्धन व्यास ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। आयोजन समिति में डॉ. नीरजा सेन, डॉ. नियति गुरुद्वान, डॉ. वैशाली शरडे, डॉ. नम्रता दुबे इत्यादि प्रमुख रूप से शामिल रहीं। कार्यक्रम में डॉ. मंजू वर्मा, डॉ. भुवनेश्वरी वर्मा, डॉ. रूपशिखा अग्रवाल, डॉ. अंजली चंद्रवंशी सहित अन्य प्राध्यापकों की भी सक्रिय भागीदारी रही।
प्राचार्य डाॅ.तपेश चन्द्र गुप्ता ने तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन अवसर पर कहा कि यह कार्यक्रम शिक्षकोंध्छात्रों के लिए ज्ञान और कौशल को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच रहा। उन्होंने प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि यहां अर्जित अनुभव और जानकारी उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में और अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगी। प्राचार्य ने आशा व्यक्त की कि इस तरह के प्रशिक्षण निरंतर जारी रहेंगे और इससे संस्था की गुणवत्ता और शिक्षा के स्तर में सुधार होगा। उन्होंने सभी प्रतिभागियों के उज्ज्वल भविष्य और सफल कार्य की कामना की।
रायपुर संभाग के विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शोधार्थी इस प्रशिक्षण में शामिल हुए, जिसमें उन्हें उन्नत शोध पद्धतियों, नैनोमटेरियल नवाचारों तथा आधुनिक तकनीकों के उपयोग संबंधी विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान किया गया।

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